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यादों में प्रेमचंद : ‘उपन्यास सम्राट’ ने समाज की कड़वी सच्चाई को दिए शब्द

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नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। महान लेखक और उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की 90वीं पुण्यतिथि गुरुवार को मनाई जाएगी। प्रेमचंद हिंदी और उर्दू साहित्य की ऐसी हस्ती थे, जिन्हें मशहूर बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

मुंशी प्रेमचंद को सिर्फ एक उपन्यासकार या कहानीकार कहना उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वह एक ऐसे लेखक थे, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीय समाज के कड़वे मुद्दे को काफी संवेदनशीलता और निर्भीकता के साथ उजागर किया। इसलिए जब भी हिंदी और उर्दू साहित्य के इतिहास की बात होगी, प्रेमचंद को जरूर याद किया जाएगा।

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही नामक गांव के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। हालांकि, शुरू में वह अपनी लेखनी को ‘नवाब राय’ नाम से भी लिखते थे। प्रेमचंद के पिता का नाम मुंशी अजायब राय था, जो डाकखाने में मुंशी थे और माता का नाम आनंदी देवी था, जो एक गृहिणी थीं।

एक आम बच्चे के बचपन से बिल्कुल विपरीत, प्रेमचंद का बचपन काफी मुश्किल और आर्थिक तंगी से गुजरा। जब प्रेमचंद महज 7 वर्ष के थे, तब उनकी माता का निधन हो गया और 16 वर्ष की आयु में उनके सिर से पिता का साया भी उठ गया। इसके बाद प्रेमचंद को परिवार का खर्च चलाने और पढ़ाई पूरी करने में आर्थिक तंगी के कारण कई प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई लमही और एक मदरसे में पूरी की, जहां उन्होंने उर्दू और फारसी सीखी। इसके बाद, उन्होंने 1898 में मैट्रिक की परीक्षा पास की और 1919 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीए की डिग्री हासिल की। ​​पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने स्कूल टीचर के तौर पर काम किया और बाद में शिक्षा विभाग में ‘सब-डिप्टी इंस्पेक्टर’ बने। हालांकि, 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद, उन्होंने ‘हंस’, ‘माधुरी’ और ‘जागरण’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया और ‘सरस्वती प्रेस’ की स्थापना की।

प्रेमचंद के नाम को लेकर भी एक रोचक कहानी है। शुरू के दिनों में वह अपनी रचनाएं ‘नवाब राय’ नाम से लिखते थे, लेकिन 1908 में जब उनका कहानी संग्रह ‘सोज-ए-वतन’ अंग्रेज सरकार द्वारा राष्ट्रवादी विचारों के कारण जब्त कर लिया गया, तब उन्हें एक नया उपनाम अपनाना पड़ा। इसके बाद वे ‘प्रेमचंद’ नाम से लिखने लगे और इसी नाम से अमर हो गए। वहीं, समय के साथ उनके नाम के आगे ‘मुंशी’ भी जुड़ गया।

बचपन से ही प्रेमचंद को लेखन में काफी रुचि थी। हालांकि, वह एक ऐसे साहित्यकार बने, जिन्होंने साहित्य में काल्पनिक दुनिया की बजाय समाज की वास्तविक और कड़वी सच्चाई को अपनी कलम से दर्शाया। उनकी रचनाओं में गरीब किसानों, दलितों, शोषितों, महिलाओं की स्थिति और समाज की कुप्रथाओं का सजीव चित्रण मिलता है।

प्रेमचंद की कुछ प्रमुख रचनाओं में ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘मंगलसूत्र’, ‘मानसरोवर’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘ईदगाह’, ‘पूस की रात’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘नमक का दरोगा’, ‘सेवा सदन’, ‘निर्मला’, आदि शामिल हैं, जिन्हें आज भी काफी पसंद किया जाता है।

मुंशी प्रेमचंद की निजी जिंदगी की बात करें तो, उन्होंने 1895 में सिर्फ 15 वर्ष की उम्र में परिवार के दबाव में शादी की थी, लेकिन उनकी पहली शादी ज्यादा समय तक नहीं चली। इसके बाद, 1906 में उन्होंने शिवरानी देवी से दूसरी शादी की, जो एक बाल-विधवा थीं। उनके तीन बच्चे थे। प्रेमचंद की दूसरी पत्नी, शिवरानी देवी, जिंदगी के हर संघर्ष में उनके साथ खड़ी रहीं और उनकी मौत के बाद उन्होंने ‘प्रेमचंद घर में’ नाम से उनकी जीवनी लिखी।

प्रेमचंद का निधन 8 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में हुआ।