Friday, July 10, 2026
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एफआईआई आउटफ्लो के बावजूद रुपया मजबूत

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मुंबई, 20 नवंबर (आईएएनएस)। भारत के मजबूत आर्थिक बुनियादी ढांचे के साथ रुपये की मजबूती बरकरार रही। बुधवार को आई एक लेटेस्ट रिपोर्ट में कहा गया कि मजबूत जीडीपी वृद्धि, नियंत्रित मुद्रास्फीति, प्रबंधित दोहरा घाटा और रिकॉर्ड विदेशी भंडार ने विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) आउटफ्लो (पूंजी निकासी) के बावजूद रुपये को मजबूत बनाए रखा।

अक्टूबर के दौरान अमेरिकी चुनाव को लेकर अनिश्चितता, मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव, चीन द्वारा प्रोत्साहन की घोषणा और अमेरिकी यील्ड के बीच अधिकांश उभरते बाजारों में एफआईआई आउटफ्लो हुआ।

मोतीलाल ओसवाल प्राइवेट वेल्थ (एमओपीडब्ल्यू) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में, ये आउटफ्लो चालू रिजल्ट सीजन के कारण और बढ़ गया, जो मूल्यांकन को उचित ठहराने में विफल रहा।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक साल में तेज उछाल देखने वाले क्षेत्रों और विशेष रूप से उन कंपनियों में सुधार अधिक स्पष्ट था, जो आय पर बाजार की अपेक्षाओं को पूरा करने में विफल रहीं।

हालांकि, 12 बिलियन डॉलर के एफआईआई आउटफ्लो के बावजूद रुपये ने लचीला रुख अख्तियार रखा यानि पहले के मुकाबले स्थिति के अनुसार डटा रहा।

रिपोर्ट के अनुसार, “इसके अलावा, विश्व बाजार पूंजीकरण में भारत का योगदान 2013 में 1.7 प्रतिशत से बढ़कर अब 4.3 प्रतिशत हो गया है और बाजार पूंजीकरण रैंकिंग के मामले में भारत 17वें स्थान से 5वें स्थान पर आ गया है।”

एक एसेट क्लास के रूप में इक्विटी भी भारतीय घरेलू बचत में अहम भूमिका निभा रही है।

लंबी अवधि में, कॉरपोरेट डीलीवरेजिंग और अगले दो वर्षों में बेहतर आय के कारण इक्विटी बाजार का रुख सकारात्मक रहा है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया, “हालांकि, भू-राजनीतिक मुद्दों, केंद्रीय बैंक की नीतियों और मूल्यांकन जैसी वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण अल्पकालिक अस्थिरता की आशंका बनी हुई है।

इसके साथ ही निवेशकों को संतुलित रणनीति के साथ सावधानी से आगे बढ़ने की सलाह दी जाती है।

जिन लोगों के पास पर्याप्त इक्विटी आवंटन है, उन्हें निवेश को बनाए रखना चाहिए, जबकि कम आवंटन वाले लोग धीरे-धीरे अपने निवेश को बढ़ा सकते हैं।

बड़े और मल्टी-कैप स्ट्रैटेजी के लिए 3 महीने में और चुनिंदा मिड और स्मॉल-कैप स्ट्रैटेजी के लिए 6-12 महीने में, अगर बाजार में महत्वपूर्ण सुधार होता है तो तेजी से निवेश किया जा सकता है।”

रिपोर्ट में कहा गया है, “भू-राजनीतिक घटनाक्रम और मैक्रोइकॉनोमिक इंडीकेटर्स के इंटरसेक्शन से वोलैटिलिटी की संभावना बनी रहेगी, जिसमें जोखिम कम करने की चाह रखने वाले निवेशकों के लिए सोना एक आकर्षक विकल्प होगा।”