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अपनी कलम से अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ाने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी, जिनकी शहादत को महात्मा गांधी ने भी किया था नमन

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नई दिल्ली, 25 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत की आजादी की लड़ाई में कई ऐसे लोगों ने योगदान दिया, जिन्होंने हथियार उठाने के बजाय अपनी कलम को ही सबसे बड़ा हथियार बना लिया। गणेश शंकर विद्यार्थी भी उन्हीं में से एक थे। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिए अंग्रेजी हुकूमत की नीतियों को चुनौती दी, किसानों और मजदूरों के हक में आवाज उठाई और समाज में फैले अन्याय के खिलाफ जमकर लिखा। उनकी पत्रकारिता का मकसद केवल खबरें छापना नहीं बल्कि आम लोगों की परेशानियों को सामने लाना और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना था। यही वजह थी कि अंग्रेजों की नाराजगी, मुकदमों और जेल की सजा भी उनके हौसले को नहीं डिगा सकी।

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को हुआ था। उनके पिता जयनारायण शिक्षक थे और उन्हें उर्दू तथा फारसी भाषाओं में दिलचस्पी थी। पिता के इसी माहौल का असर गणेश शंकर विद्यार्थी पर भी पड़ा। उन्हें बचपन से ही पढ़ने-लिखने का शौक था। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए वह अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। हालांकि, उन्होंने स्वाध्याय के जरिए ज्ञान हासिल करना जारी रखा। नौकरी करते हुए भी उनका लेखन नहीं रुका। धीरे-धीरे पत्रकारिता उनके जीवन का उद्देश्य बन गई और उन्होंने अपने नाम के साथ ‘विद्यार्थी’ शब्द जोड़ लिया।

गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्होंने 9 नवंबर 1913 को कानपुर से साप्ताहिक अखबार ‘प्रताप’ की शुरुआत की। इस अखबार के जरिए उन्होंने किसानों, मजदूरों और शोषित लोगों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। उस दौर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर लिखना आसान नहीं था लेकिन विद्यार्थी ने अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद रखी।

उन्होंने चंपारण के किसानों की समस्याओं, मिल मजदूरों की दुर्दशा और जमींदारों के अत्याचारों पर लिखा। रायबरेली में किसानों पर हुई गोलीबारी के मामले को भी उन्होंने प्रमुखता से उठाया। उनके लेखों ने उन लोगों को आवाज दी, जिनकी परेशानियां अक्सर सत्ता और व्यवस्था के बीच दबकर रह जाती थीं।

उनकी निर्भीक पत्रकारिता के कारण ‘प्रताप’ अंग्रेजी हुकूमत की नजरों में खटकने लगा। विद्यार्थी को कई बार मुकदमों और जेल की सजा का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। उनके लिए पत्रकारिता केवल पेशा नहीं बल्कि जनता के प्रति जिम्मेदारी थी।

गणेश शंकर विद्यार्थी महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए। उन्होंने असहयोग आंदोलन और होम रूल आंदोलन में भी हिस्सा लिया। हालांकि उनकी पहचान केवल गांधीवादी विचारों तक सीमित नहीं थी। वह भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में भी रहे। उनके अखबार ‘प्रताप’ का दफ्तर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई लोगों के लिए महत्वपूर्ण ठिकाना बन गया था।

विद्यार्थी का मानना था कि देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले लोगों के प्रयासों को समझना और उनका साथ देना जरूरी है। वह अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने से पीछे नहीं हटते थे। उनकी इसी निर्भीकता के कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें कई बार जेल भेजा। इसके बावजूद उन्होंने पत्रकारिता और जनसेवा का रास्ता नहीं छोड़ा।

गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन का सबसे दर्दनाक अध्याय मार्च 1931 में सामने आया। 23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिए जाने के बाद देश के कई हिस्सों में तनाव का माहौल था। इसी दौरान कानपुर में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। हालात इतने बिगड़ गए कि कई इलाकों में लोगों की जान खतरे में पड़ गई।

ऐसे समय में विद्यार्थी ने अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना हिंसा प्रभावित इलाकों में जाकर लोगों को बचाने का प्रयास किया। वह चाहते थे कि हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे के दुश्मन बनने के बजाय मिल-जुलकर रहें। बताया जाता है कि उन्होंने दोनों समुदायों के लोगों को हिंसक भीड़ से बचाने की कोशिश की। 25 मार्च 1931 को इसी प्रयास के दौरान हिंसक भीड़ ने उनकी जान ले ली।

गणेश शंकर विद्यार्थी की मौत से महात्मा गांधी बेहद दुखी हुए थे। हालांकि, उनके बलिदान को लेकर गांधी जी के अंदर केवल दुख ही नहीं बल्कि उनके साहस और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति समर्पण के लिए गहरा सम्मान भी था।