बिलासपुर, 1 सितंबर (आईएएनएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ऋषभ सोनी और उनकी पत्नी कोमल सोनी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा अस्थायी रूप से कुर्क की गई छह अचल संपत्तियों के स्थान पर 4.36 करोड़ रुपए की सावधि जमा (एफडी) स्वीकार करने का अनुरोध किया था।
न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई वैधानिक या कानूनी अधिकार साबित नहीं कर सके, जिसके आधार पर संपत्तियों के बदले एफडी स्वीकार करने का निर्देश दिया जा सके।
अदालत ने कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) और इसके तहत बनाए गए 2013 के नियमों में सामान्य तौर पर कुर्क अचल संपत्तियों को एफडी से प्रतिस्थापित करने का प्रावधान नहीं है। केवल नियम 5(5) के तहत कुछ सीमित परिस्थितियों में ही ऐसी अनुमति दी जा सकती है।
जिला खनिज कोष (डीएमएफ) में अनियमितताओं से जुड़े कथित अपराध की आय के समतुल्य मूल्य के रूप में ईडी द्वारा 9 दिसंबर, 2024 को संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त कर लिया गया था।
इसके बाद 23 मई 2025 को निर्णायक प्राधिकरण द्वारा इस कुर्की की पुष्टि की गई।
याचिकाकर्ताओं ने पीएमएलए अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष पुष्टि को चुनौती दी थी और उन अपीलों के लंबित रहने के दौरान छह संपत्तियों के प्रतिस्थापन की मांग की थी।
उन्होंने तर्क दिया कि वे समान मूल्य की एक तरल सावधि जमा राशि उपलब्ध कराने के लिए तैयार थे और संपत्तियों को केवल समतुल्य मूल्य के आधार पर जब्त किया गया था, न कि अपराध की प्रत्यक्ष आय के रूप में।
उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय का असाधारण क्षेत्राधिकार राहत को आकार दे सकता है, भले ही न्यायाधिकरण के पास शक्ति का अभाव हो।
ईडी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इस तरह के प्रतिस्थापन के लिए कोई सामान्य वैधानिक प्रावधान नहीं है और याचिकाकर्ताओं को रिट याचिका दायर करने के बजाय पीएमएलए की धारा 42 के तहत वैधानिक अपील का लाभ उठाना चाहिए था।
एजेंसी ने उन सामग्रियों की ओर भी इशारा किया जो कथित तौर पर आवास प्रविष्टियों और कमीशन के भुगतान के माध्यम से डीएमएफ निधि की हेराफेरी का संकेत देती हैं।
इस याचिका को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि केवल समतुल्य सावधि जमा की पेशकश करने से प्रतिस्थापन का अधिकार उत्पन्न नहीं होता है।
इसमें कहा गया है कि नियम 5(5) केवल संयुक्त स्वामित्व के मामलों में लागू होता है और अभिव्यक्ति “स्वीकार कर सकते हैं” का उपयोग करता है, जिससे स्वीकृति विवेकाधीन हो जाती है।
अदालत ने यह भी कहा कि केवल कठिनाई ही वैधानिक योजना को रद्द नहीं कर सकती, खासकर तब जब कुर्की की वैधता का मामला स्वयं न्यायाधिकरण के समक्ष लंबित हो।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने दोहराया कि जब कोई विशेष क़ानून एक प्रभावी उपाय प्रदान करता है, तो उच्च न्यायालय को सामान्यतः अनुच्छेद 226 के तहत अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
याचिका को बिना किसी लागत संबंधी आदेश के खारिज कर दिया गया।
