दिल्ली दंगा : सुप्रीम कोर्ट में उमर खालिद की पुनर्विचार याचिका खारिज, कहा- कोई वैध आधार नहीं

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नई दिल्ली, 20 अप्रैल (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद की ओर से दायर एक पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में उमर खालिद ने 5 जनवरी के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि पुनर्विचार के लिए कोई वैध आधार नहीं बनता है।

जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका और उसके साथ संलग्न दस्तावेजों को देखने के बाद, हमें 5 जनवरी 2026 के फैसले पर पुनर्विचार करने का कोई ठोस आधार या कारण नहीं मिला। इस कारण से पुनर्विचार याचिका खारिज की जाती है।

शीर्ष अदालत ने पुनर्विचार याचिका पर मौखिक सुनवाई के अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया।

इससे पहले, 13 अप्रैल को उमर खालिद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जस्टिस कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया था और आग्रह किया था कि पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की जाए।

सिब्बल ने निवेदन किया था कि मैं एक बात का उल्लेख करना चाहता था कि उमर खालिद के मामले में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। मेरा मानना ​​है कि यह बुधवार को सूचीबद्ध है। मेरा अनुरोध है, यह केवल आपके विचारार्थ है कि क्या आप इस पर खुली अदालत में सुनवाई कर सकते हैं?”

जस्टिस कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने जवाब दिया कि वे इस अनुरोध की जांच करेंगे और कहा कि हम दस्तावेजों को देखेंगे, और यदि आवश्यक हुआ, तो हम इसे सुनवाई के लिए बुलाएंगे।”

आमतौर पर, पुनर्विचार याचिकाओं पर सीमित आधारों पर जैसे कि रिकॉर्ड के अवलोकन मात्र से स्पष्ट होने वाली त्रुटियों के आधार पर, चैंबर में ही फैसला किया जाता है, और शायद ही कभी उन्हें खुली अदालत में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाता है।

इस साल जनवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में खालिद और सह-आरोपी शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने पांच अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी थी।

जस्टिस कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष की सामग्री से दोनों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है, जिस पर गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर वैधानिक रोक लागू होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की सामग्री और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत खालिद को जमानत पर रिहा करने का आधार नहीं बनते और इनसे संकेत मिलता है कि वह योजना बनाने, लोगों को जुटाने और रणनीतिक निर्देश देने के स्तर पर शामिल था।