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संवैधानिक अधिकारियों के इस्तीफे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब

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नई दिल्ली, 3 सितंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार से जनहित याचिका (पीआईएल) पर जवाब मांगा। इस याचिका में मांग की गई है कि उन संवैधानिक अधिकारियों को भत्ते, सुविधाएं और अन्य लाभ न दिए जाएं जो कथित तौर पर पद से हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए कार्यकाल के बीच में ही इस्तीफा दे देते हैं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने भारत सरकार को नोटिस जारी किया और मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर के लिए तय की।

मुंबई निवासी याचिकाकर्ता प्रतीक वीरा ने वकील संग्रामसिंह आर. भोंसले के जरिए यह पीआईएल दायर की है। इसमें ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा तय कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देने से जुड़े एक बड़े संवैधानिक मुद्दे को उठाया गया है।

याचिका के अनुसार, जो संवैधानिक अधिकारी एक निश्चित कार्यकाल के लिए चुने या नियुक्त किए जाते हैं, उन पर अपना कार्यकाल पूरा करने और अपने पद से जुड़ी जिम्मेदारियों को निभाने की संवैधानिक बाध्यता होती है, जब तक कि उन्हें संविधान में बताई गई प्रक्रिया के तहत हटाया न जाए।

पीआईएल में कहा गया है कि पद से हटाए जाने या अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया से बचने के लिए बीच में ही इस्तीफा देना, ऊंचे पद से हटाने से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मकसद को खत्म करता है। इसमें कहा गया है कि ‘ऊंचा संवैधानिक पद ऐसे अधिकारियों पर एक अलिखित संवैधानिक दायित्व डालता है’ कि वे या तो अपना कार्यकाल पूरा करें या पद से हटाए जाने की पारदर्शी प्रक्रिया का सामना करें।

इसमें यह भी दावा किया गया है कि इस्तीफे के बाद मिलने वाले भत्ते और फायदे संवैधानिक अधिकारियों को इस्तीफा देने के लिए प्रेरित करते हैं, बजाय इसके कि वे ऐसी कार्रवाई का सामना करें जिसके परिणामस्वरूप उन्हें हटाया जा सकता है।

पीआईएल में तर्क दिया गया है कि ‘पद से हटाए जाने से बचने के लिए इस्तीफा देने का आसान विकल्प न तो सोचा गया था और न ही यह वांछनीय है’ और ऐसा व्यवहार ऊंचे संवैधानिक अधिकारियों में संविधान द्वारा जताए गए भरोसे को खत्म करता है।

याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने की मांग की है कि जो संवैधानिक अधिकारी विशेष रूप से पद से हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देते हैं, वे उन भत्तों, सुविधाओं या लाभों के हकदार नहीं होने चाहिए जो अन्यथा उनके कार्यकाल पूरा होने पर मिलते।

याचिका में तर्क दिया गया है कि ऐसा कदम ‘सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक व्यवहार’ को बढ़ावा देने में मदद करेगा। इसमें गैर-संवैधानिक अधिकारियों के साथ तुलना भी की गई है, जिसमें कहा गया है कि ऐसे कर्मचारियों पर लागू सेवा नियम आम तौर पर इस्तीफा देने पर रोक लगाते हैं जब विभागीय कार्यवाही लंबित हो और जिसके परिणामस्वरूप उन्हें हटाया जा सकता है या कोई अन्य सजा मिल सकती है।

पीआईएल के अनुसार, संवैधानिक पदों पर बैठे लोग गैर-संवैधानिक कर्मचारियों की तुलना में ऊंचे पद पर होते हैं, इसलिए उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करके या संविधान में बताई गई हटाने की प्रक्रिया का सामना करके ज्‍यादा ईमानदारी दिखानी चाहिए।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देने के बाद मिलने वाले फायदों के मामले में संवैधानिक पद के अधिकारियों के साथ अलग व्यवहार करना ‘भेदभावपूर्ण’ है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से इस मुद्दे को संवैधानिक कानून के एक शुद्ध सवाल के तौर पर देखने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि यह पीआईएल किसी खास व्यक्ति के खिलाफ नहीं है और न ही किसी खास घटना पर आधारित है।

याचिका में ऐसे नियम बनाने के लिए उचित निर्देश भी मांगे गए हैं जो इस्तीफा देने या रिटायर होने के बाद मिलने वाले फायदों को उन संवैधानिक पद के अधिकारियों पर लागू न करें जो अपने पद से हटाए जाने की कार्यवाही से बचने के लिए कार्यकाल के बीच में ही इस्तीफा दे देते हैं।

पीआईएल में नागरिकों के बीच बनी इस धारणा पर भी चिंता जताई गई है कि संवैधानिक पद के अधिकारी इस्तीफा देकर हटाने की कार्यवाही को रोक सकते हैं और फिर भी अपने पद से जुड़ी सुविधाओं और फायदों को बनाए रख सकते हैं। याचिका में ऐसे इस्तीफों को ‘संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने से बचने का एक सिद्धांत-हीन तरीका’ बताया गया है। साथ ही, यह तर्क दिया गया है कि यह चलन कानून के शासन के खिलाफ है, जो संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।