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लेखिका शुभ्रा सक्सेना की नई पुस्तक ‘इट मैटर्स अ लॉट’ लॉन्च, जीवन के अर्थ पर करती है चिंतन

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर (आईएएनएस)। लेखिका शुभ्रा सक्सेना की नई किताब ‘इट मैटर्स अ लॉट’ आधिकारिक तौर पर लॉन्च हो गई है। परम पावन दलाई लामा द्वारा लिखी गई प्रस्तावना वाली यह किताब पाठकों को इस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि जीवन में वास्तव में क्या मायने रखता है।

पुस्तक विमोचन के अवसर पर दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में लेखिका ने कहा कि यह पुस्तक सचेत और सार्थक जीवन जीने की दिशा में एक चिंतनशील यात्रा प्रस्तुत करती है।

लेखिका शुभ्रा सक्सेना ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “आज के समय में, खासकर युवाओं का जीवन लगातार मिलने वाली उत्तेजनाओं और सूचनाओं से भरा हुआ है। ऐसे में सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। जीवन की भागदौड़ में लोग यह भूलते जा रहे हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है और इसे सही मायनों में कैसे जीना चाहिए। इसीलिए लोगों को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करने और कुछ पल ठहरकर सोचने का अवसर देने के उद्देश्य से मैंने यह किताब लिखी है, ताकि वे इसे पढ़ने के लिए थोड़ा समय निकालें और इस बात पर विचार करें कि जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है।”

उन्होंने कहा, “किताब के शीर्षक का मतलब है कि बहुत जरूरी है। क्या जरूरी है, यह सभी के लिए बहुत मायने करता है। जो मनुष्य जीवन मिला है, हमें इसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। हम यहां पर क्यों आए हैं। हम किस तरीके का जीवन जीते हैं, वह हमें पता चलना चाहिए। भागदौड़ में हम जो जीवन जीते हैं, उसका असली मूल्य नहीं समझ पाते हैं। इसलिए जीवन का असली अर्थ पता होना चाहिए।”

दलाई लामा से मुलाकात का जिक्र करते हुए शुभ्रा सक्सेना ने कहा, “मेरी हाल में दलाई लामा से मुलाकात हुई थी। इस किताब की प्रस्तावना लिखकर एक तरह से उन्होंने आशीर्वाद दिया है। किताब में जो बातें की गई हैं, वह उनकी शिक्षा से काफी मिलती-जुलती हैं। मनुष्य जीवन में दया भावना होनी चाहिए। इस किताब में भी उस चीज को बताया गया है।”

उन्होंने कहा, “इस किताब का मुख्य उद्देश्य ही यही है कि जिस भागदौड़ भरी जिंदगी में आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि जीवन क्या है। हर चैप्टर के अंदर में तीन-चार सवाल हैं और उसके आगे एक खाली पन्ना है। ऐसे में जब आप यह सवाल पूछेंगे तो अपने जवाब उसमें लिख सकते हैं। हम आत्मचिंतन करना जो भूल चुके हैं। यह किताब हमें उसके बारे में सिखाना चाहती है कि लोग अपने अंदर देखें और अपनी सोच पर विचार करें।”

लेखिका ने बताया कि इस किताब का बीज उनके बचपन में ही पड़ गया था। “मैं यहां क्यों हूं? इसी सवाल से इस किताब की शुरुआत हुई। मैं छह साल की थी। मैं अपना होमवर्क कर रही थी। मेरी मां दोपहर का खाना बना रही थीं और एक कमरे से दूसरे कमरे में आ-जा रही थीं और अचानक मेरे मन में यह खयाल आया कि हम क्या कर रहे हैं और हम यह सब क्यों कर रहे हैं? इन सबका क्या मतलब है? अगर हमारा अस्तित्व है, तो हमारा अस्तित्व क्यों है?”

कार्यक्रम में मौजूद लेखक गुरचरण दास ने कहा, “यह ऊपर से कुछ और ही लगती है। ऐसा लगता है जैसे यह कोई ‘सेल्फ-हेल्प’ किताब हो, लेकिन इसकी गहराई में बहुत ही गंभीर और गहरी सोच छिपी है और हर अध्याय के साथ इसने मेरे दिमाग में कोई न कोई नया विचार जगा दिया।”