10 ग्राम हेरोइन दोषी शख्स को बरी करने की वजह बन गई, अभियोजन की लापरवाही पर दिल्ली हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

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नई दिल्ली, 8 मई (आईएएनएस)। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2012 में हेरोइन बरामदगी मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां और गवाहियों में असंगतियां पाई गईं, जिससे हेरोइन की बरामदगी और उसकी सुरक्षित हिरासत पर उचित संदेह पैदा होता है। इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि आरोप साबित नहीं हो पाए और इसका लाभ देते हुए उसे बरी किया जाना उचित है।

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा की एकल पीठ ने ​​सुनील शर्मा द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें उन्हें एनडीपीएस अधिनियम की धारा 21(सी) के तहत दोषी ठहराया गया था और 1 लाख रुपए के जुर्माने के साथ 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के अधिकारियों ने 18 मई, 2012 को सिंघु सीमा पर आरोपी को उस समय पकड़ा था, जब वह होंडा सिविक कार के बोनट के नीचे एक किलोग्राम हेरोइन छिपाकर ले जा रहा था।

हालांकि, दिल्ली उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष द्वारा जब्त किए गए प्रतिबंधित पदार्थ के प्रबंधन, नमूना लेने की प्रक्रिया और इन्वेंट्री रिकॉर्ड में कई विसंगतियां पाईं।

अपने फैसले में जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि जब्त किए गए पदार्थ से पांच-पांच ग्राम के दो नमूने लिए गए थे, लेकिन बाद में तैयार की गई इन्वेंट्री में हेरोइन की मात्रा अब भी एक किलोग्राम ही दिखाई गई थी।

जज ने कहा कि तीन गवाहों (पीडब्ल्यू 3, पीडब्ल्यू 4 और पीडब्ल्यू 9 ) के बयान के मुताबिक जब्त नशीले पदार्थ से जब पहले ही 10 ग्राम नमूने के रूप में निकाला जा चुका है तो संभव ही नहीं था कि पैकेट में मौजूद बचा हेरोइन 1 किलोग्राम हो।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने जब्त किए गए सामान की कस्टडी और ट्रांसफर से जुड़े दस्तावेजों की कमी पर भी गंभीर सवाल उठाए।

न्यायाधीश ने कहा, “पीडब्ल्यू 9 का यह दायित्व था कि वह मामले की संपत्ति/सामग्री को धारा 53 के तहत अधिकृत अधिकारी पीडब्ल्यू 9 को बिना किसी देरी के सौंप दे। ऐसे कोई सबूत नहीं हैं, जिनसे यह साबित हो कि पीडब्ल्यू 9 ने वास्तव में 18 मई 2012 को पीडब्ल्यू 10 को सौंपी थी।”

जज ने कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष सूची तैयार करने और नमूना लेने से संबंधित एनडीपीएस अधिनियम की धारा 52ए के प्रावधानों का सख्ती से पालन नहीं किया गया।

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि यद्यपि प्रत्येक चूक स्वतः ही अभियोजन को अमान्य नहीं कर देती, फिर भी न्यायालयों को उन मामलों में साक्ष्यों की गहन जांच करनी चाहिए जहां वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया है।

न्यायाधीश ने कहा, “आपराधिक न्यायशास्त्र का यह एक स्थापित सिद्धांत है कि अपराध जितना गंभीर होगा, सबूत का स्तर उतना ही सख्त होगा और किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए उच्च स्तर के आश्वासन की आवश्यकता होगी।”

आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले को संभालने के तरीके को लेकर जांच अधिकारियों के खिलाफ तीखी टिप्पणियां कीं।

न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “हेरोइन एक बेहद खतरनाक नशीला पदार्थ है और इसकी इतनी बड़ी मात्रा पूरी पीढ़ियों को नष्ट कर सकती है। हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि डीआरआई के अधिकारियों ने इस मामले को वह महत्व नहीं दिया जिसका यह हकदार था।”

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने आगे कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारियों की ढिलाई और घोर लापरवाही के कारण ही आरोपी को लाभ मिला। आरोपी के विरुद्ध निश्चित रूप से गंभीर संदेह है, लेकिन संदेह, चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।”

भविष्य में एनडीपीएस जांचों में वैधानिक सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन करने का आह्वान करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि निर्णय की एक प्रति दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को भेजी जाए ताकि वे संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी कर “एनडीपीएस अधिनियम के तहत निर्धारित औपचारिकताओं का कड़ाई से पालन करें और इस प्रकार के अन्याय को रोकें।”