नई दिल्ली, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की एक याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस याचिका में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह भारत में काम कर रहे अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (एआईएफ), फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (एफपीआई) और उनके मध्यस्थों के ‘अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स’ (वास्तविक लाभार्थी मालिकों) और इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो का पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से उजागर करना अनिवार्य करे।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, आर. महादेवन और डी.के. उपाध्याय की पीठ ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए कोई मौजूदा कानूनी या नियामक ढांचा नहीं है, इसलिए मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती।
हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने मोइत्रा को अपनी याचिका में उठाई गई शिकायतों के संबंध में केंद्र सरकार और सेबी से संपर्क करने की अनुमति दी।
न्यायमूर्ति नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ‘अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स’ (वास्तविक लाभकारी मालिकों) की जानकारी पूरी तरह से सार्वजनिक करने के लिए कोई कानूनी ढांचा या नियम न होने के कारण, सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश देने के लिए ‘रिट ऑफ मैंडमस’ जारी नहीं कर सकता।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, “ऐसे किसी ढांचे के अभाव में यह न्यायालय अपने विवेक का इस्तेमाल करके प्रतिवादियों (प्राधिकरणों) को ऐसी जानकारी पूरी तरह सार्वजनिक करने का आदेश देने वाली ‘रिट ऑफ मैंडमस’ जारी नहीं कर सकता।”
सुनवाई के दौरान, मोइत्रा की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि विदेशी संस्थाओं के जरिए भारतीय कंपनियों में भारी निवेश किया जा रहा है, जबकि असल निवेशकों की पहचान अज्ञात है।
उन्होंने तर्क दिया कि पारदर्शिता की कमी से सेबी के नियमों के उल्लंघन और बड़ी रकम निवेश करने वाली संस्थाओं द्वारा शेयर बाजार में हेरफेर किए जाने की आशंका पैदा होती है।
भूषण ने कहा कि कई देशों में ‘बेनिफिशियल ओनरशिप’ (लाभकारी स्वामित्व) की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य है।
हालांकि, जस्टिस नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने सवाल उठाया कि क्या शीर्ष अदालत ऐसा निर्देश दे सकती है, जबकि प्रस्तावित खुलासों को अनिवार्य करने वाली कोई नीति ही मौजूद नहीं है।
कोर्ट ने टिप्पणी की, “अगर कोई ऐसी नीति है जिसके तहत सार्वजनिक रूप से खुलासा करना जरूरी है, और आप उसे लागू करने के लिए ‘मैंडमस’ (आदेश) की मांग करते हैं, तो वह एक अलग बात है। लेकिन अगर कोई नीति ही मौजूद नहीं है, तो क्या हम ऐसा आदेश जारी कर सकते हैं?”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि देश में विदेशी निवेश न आए।
प्रशांत भूषण ने इस बात का जवाब देते हुए कहा कि ‘अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स’ (वास्तविक लाभार्थी मालिकों) का खुलासा करने से वैध निवेश को कोई नुकसान नहीं होगा।
अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एआईएफ और एफपीआई द्वारा किए गए निवेशों का विवरण सेबी या कस्टोडियन को दिया जा रहा है, जिससे नियामक निगरानी संभव हो पाती है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई मौजूदा कानूनी ढांचा नहीं है जो याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई इकाई-वार निवेशों का सार्वजनिक रूप से खुलासा करना अनिवार्य बनाता हो।

