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नालंदा की ऐतिहासिक भूमि पर विश्वरंग : ज्ञान, भाषा, साहित्य, कला और एशिया के साथ संवाद

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संतोष चौबे

भारत को समझने के लिए केवल उसका राजनीतिक इतिहास पढ़ना पर्याप्त नहीं है। भारत का एक दूसरा इतिहास भी है—विश्वविद्यालयों, गुरुकुलों, पुस्तकालयों, यात्राओं, भाषाओं, लोक-स्मृतियों, कलाओं और उन सांस्कृतिक संपर्कों का इतिहास, जिनके माध्यम से एक भूगोल दूसरे भूगोल से जुड़ता रहा। यह विचारों की आवाजाही, ज्ञान के आदान-प्रदान और मनुष्य की उस जिज्ञासा का इतिहास है, जो अपने से भिन्न संसार को जानना चाहती है। नालंदा इसी इतिहास का महत्वपूर्ण स्थल है, जहाँ भारतीय बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना का व्यापक एशियाई आयाम दिखाई देता है।

इसीलिए नालंदा की भूमि पर‘विश्वरंग’का आयोजन केवल किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम को दूसरे शहर में ले जाना नहीं है। यहाँ स्थान स्वयं विचार का हिस्सा बन जाता है। एक ओर नालंदा की वह ऐतिहासिक स्मृति है, जहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन-विमर्श के लिए आते थे; दूसरी ओर विश्वरंग की समकालीन दृष्टि है, जो विभिन्न भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं और सांस्कृतिक क्षेत्रों के रचनाकारों, कलाकारों और शिक्षाविदों को संवाद के लिए एक मंच पर लाती है। इस अर्थ में यह आयोजन इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसकी समकालीन प्रतिध्वनि है।

आज जब शिक्षा के सामने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी परिवर्तन, रोजगार, कौशल, पर्यावरण और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियाँ हैं, तब नालंदा की स्मृति का अर्थ अतीत को हूबहू पुनर्स्थापित करना नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह पूछना है कि हमारी वर्तमान ज्ञान-संस्थाएँ कितनी खुली, बहुविषयक, संवादशील और समाज से जुड़ी हैं। क्या विश्वविद्यालय केवल अपने-अपने विषयों की सीमाओं में काम करेंगे या भाषा, साहित्य, कला, तकनीक और समाज के बीच नए संवादों के लिए भी जगह बनाएँगे? नालंदा में विश्वरंग का विमर्श इसी प्रश्न को समकालीन संदर्भ देता है।

विश्वरंग की सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों को एक-दूसरे के निकट लाना तथा भारत को उसके व्यापक एशियाई संदर्भ में देखना है। नालंदा इस उद्देश्य को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देता है। यहाँ सांस्कृतिक संवाद कोई नई आवश्यकता नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की निरंतर विकसित होती प्रक्रिया के रूप में सामने आता है।

भारतीय भाषाएँ : विविधता से संवाद तक

भारत की भाषाई विविधता को केवल बहुलता का उदाहरण मानना पर्याप्त नहीं है। भाषाएँ पहचान के साथ-साथ संसार को देखने की अलग-अलग दृष्टियाँ भी संजोती हैं। उनके साहित्य, लोक-स्मृतियाँ, मुहावरे, मिथक और जीवन-अनुभव किसी समाज की सामूहिक चेतना को आकार देते हैं। इसलिए भारतीय भाषाओं का प्रश्न केवल संरक्षण का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मबोध का भी प्रश्न है।

विश्वरंग में विभिन्न भारतीय भाषाओं के रचनाकारों को साथ लाने का उद्देश्य किसी एक भाषा को केंद्र में रखकर दूसरी भाषाओं को उसके आसपास स्थापित करना नहीं, बल्कि भाषाओं के बीच बराबरी का संवाद बनाना है। इसी संदर्भ में पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं और साहित्य को व्यापक भारतीय विमर्श में स्थान देना महत्वपूर्ण है। यह किसी क्षेत्र को एकतरफा ‘मुख्यधारा’ में लाने से अधिक, भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य की परिभाषा को विस्तृत करने की प्रक्रिया है।
इस संवाद मेंअनुवादकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। जब मलयालम का पाठक असमिया साहित्य पढ़ता है, मराठी का पाठक मणिपुरी कथा से परिचित होता है या हिंदी का पाठक तमिल, बांग्ला, पंजाबी, कोंकणी अथवा कश्मीरी साहित्य में प्रवेश करता है, तो यह केवल साहित्य का विस्तार नहीं होता; अनुभवों की साझेदारी का विस्तार भी होता है। बहुभाषी भारत में अनुवाद सांस्कृतिक संवाद की आधारभूत संरचना बन सकता है।

कला और टैगोर : संस्कृति की व्यापक दृष्टि

विश्वरंग की प्रकृति में साहित्य को कला से अलग करके नहीं देखा जाता। संस्कृति संगीत, नाटक, चित्रकला, सिनेमा और नृत्य में भी अभिव्यक्त होती है। भारतीय कला-परंपराओं की बहुलता बताती है कि संस्कृति कोई स्थिर वस्तु नहीं है। शास्त्रीय और लोक, परंपरा और आधुनिकता, क्षेत्रीय और वैश्विक—इनके बीच निरंतर संवाद से संस्कृति विकसित होती है। इसलिए सांस्कृतिक संवाद को केवल चर्चाओं तक सीमित रखने के बजाय उसकी रचनात्मक अभिव्यक्तियों तक ले जाना भी आवश्यक है।

नालंदा से पटना और वहाँ से रवीन्द्रनाथ टैगोर तक पहुँचने वाली सांस्कृतिक यात्रा भी स्वाभाविक है। नालंदा भारत और एशिया के ऐतिहासिक सांस्कृतिक संवाद का प्रतीक है, वहीं टैगोर ने आधुनिक समय में अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए दूसरी संस्कृतियों से संवाद की मानवीय और वैश्विक दृष्टि विकसित की। इस अर्थ में टैगोर पर होने वाला विमर्श नालंदा की ऐतिहासिक चेतना का आधुनिक विस्तार बनता है।

नालंदा की विरासत का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका एशियाई विस्तार भी है। ज्ञान और बौद्धिक परंपराओं का प्रभाव दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचा। इसलिए नालंदा से जुड़ा वर्तमान सांस्कृतिक विमर्श स्वाभाविक रूप से भारत से आगे एशिया तक जाता है। इतिहास के इन संपर्कों को आज शिक्षा, संस्कृति, व्यापार और सतत विकास के नए संदर्भों में समझने की आवश्यकता है।

संस्कृति और सतत विकास

संस्कृति का संबंध केवल विरासत से नहीं, भविष्य से भी है। किसी समाज का सांस्कृतिक ज्ञान उसके प्राकृतिक संसाधनों, पारंपरिक शिल्प, कृषि-पद्धतियों, स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक जीवन से जुड़ा होता है। इसलिए सतत विकास की चर्चा में सांस्कृतिक संदर्भों को शामिल करना विकास को अधिक मानवीय और स्थानीय बना सकता है।

विश्वरंग के लिए यह विस्तार इसलिए महत्वपूर्ण है कि संस्कृति को केवल अतीत की विरासत के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की कल्पना में सक्रिय तत्व के रूप में देखा जाए। प्रश्न यह भी है कि वर्तमान भारत किस प्रकार का विकास चाहता है और उसमें मनुष्य, प्रकृति, समाज तथा सांस्कृतिक विविधता का स्थान क्या होगा।
भारत की सांस्कृतिक एकता को समानता समझना उचित नहीं होगा। उसकी शक्ति इस बात में है कि अनेक भाषाएँ, परंपराएँ और जीवन-पद्धतियाँ अपनी विशिष्टता बनाए रखते हुए भी एक-दूसरे से संवाद कर सकती हैं। विश्वरंग का मंच इसी बहुलता को संवाद में बदलने की कोशिश करता है। इसका उद्देश्य किसी एक सांस्कृतिक रूप को ‘भारतीय संस्कृति’ का एकमात्र प्रतिनिधि मानना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृतियों के परस्पर संबंधों को समझने का अवसर तैयार करना है।

अतीत से संवाद, भविष्य की तैयारी

इन सभी आयामों को साथ रखकर एक व्यापक भारत-दृष्टि उभरती है—ऐसी दृष्टि जो अपनी विरासत से परिचित है, लेकिन अतीत में बंद नहीं; जो विविधता को स्वीकार करती है, लेकिन संवाद की संभावनाओं को समाप्त नहीं करती; जो आधुनिकता को अपनाती है, लेकिन अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को पीछे नहीं छोड़ती; और जो विश्व से संवाद करती है, लेकिन उस संवाद के लिए आत्मविश्वास अपनी सांस्कृतिक जड़ों से प्राप्त करती है।

आज भारत को आर्थिक और तकनीकी प्रगति के साथ अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विविधता को नए संवादों में बदलने की भी आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों की भूमिका यहाँ महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें केवल कार्यक्रम आयोजित करने वाले मंच न रहकर ऐसे स्थान विकसित करने होंगे जहाँ भाषा, साहित्य, ज्ञान, कला, तकनीक, अर्थव्यवस्था और समाज एक-दूसरे से संवाद कर सकें।

नालंदा इस प्रयास का असाधारण प्रतीक है। उसकी सबसे बड़ी विरासत शायद उसकी इमारतों में नहीं, बल्कि उस विचार में है किज्ञान यात्रा करता है, संस्कृतियाँ संवाद करती हैं और मनुष्य अपने से भिन्न संसारों को समझकर स्वयं भी विस्तृत होता है।

इसलिए नालंदा की ऐतिहासिक भूमि पर विश्वरंग का अर्थ अतीत की ओर लौटना भर नहीं, बल्कि अतीत से संवाद करते हुए भविष्य की ओर बढ़ना है। यही संवाद भारत की बहुभाषिकता, बहुसांस्कृतिकता और उसकी व्यापक एशियाई चेतना को समकालीन संदर्भ में समझने का एक अवसर भी बन सकता है।